Thursday, June 17, 2010

कलयुगी मेहरारू

अब सीता सावित्री लक्ष्मी पार्वती
जइसन नाम
आउटडेटेड हो रहल बा
काहे की अब लोग/
अपना आंख के पानी
अपने धो रहल बा
लाज ओइसही बिलाइल जाता
जईसे गरम तावा पर पानी के एगो बूंद
रेगिस्तान में घडी भर के वरखा
अब आँखिन में सरम के काजर नइखे लागत
बेसरमी के सुरमा लागत बा
पुन्न भागत बा/ पाप जागत बा
अंधरिया के चान नियर/कपडा
घटत जात बा देहीं से
नेह लागत बा जेहि सेही से
पति परमेश्वर के भाव
घटत जाता
बॉय फ्रेंड से नेह/सटल जाता
संस्कार के सुरुज के ग्रहण लागल बा
गुरु सूतल बाड़े/ राहू जागल बा
कहाँ जाई मेहरारूअन के
इ स्वतंत्रता केहू के का बुझाता?
का करबे विधाता
पब में गईला के बहार हो गइल
अपना संस्कृति के बंटाधार
हो गइल
रोकवइया कहतारे/ पुरातनपंथी
आ एह पर बुद्धिजीवी लोगन के
अजबे बा नारा
केशरिया वालन के करानी बा सारा
नइखे लउकत देवी कहायवाली
के चरितार कहाँ, जा रहल बा
उडीस चाटत बा/घुन खा रहल बा
देह के/नेह के
कहे की कम्निष्ठ लोग
दवरी करेला बिना मेह के
(इ कविता "भोजपुरी माटी" कोलकत्ता के अगस्त,२००९ अंक में छपल रहे.)

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