जरल रोटी
गरहन लागल चान
बाकिर
आस मरल ना
कहियो त होई बिहान
राहू लागले ना रही
हटबे करी
आ भूख के रात
कटबे करी
एही उमेद पर
जिनिगी चलले
करेजा वाला जिएला
डरपोक हाथ मलेला
ओठ झुराला
फाटेला
जेठ के खेत नियर
पाहून के रहिया
देखतनिहारत
दिन कटेला
तरी मिली
कहियो ना कहियो
हरिहरी आई
मन रसगर बनाई
कटगर भइल मनई
के हरखाई
तबले सबुर रखल
जरूरी ह
ए उमेद में
कि रात हरमेस ना रही
भोर अइबे करी
सुतल मन के
जगइबे करी
अन्हरिया केदूदुरइबे करी
तब लगी कि
हियावा पर
गरहन नइखे
बस एही भाव में
जियत रहीं आ
जिनिगी के लुगरी
उमेद के डोरी से सियत रहीं.
Tuesday, June 22, 2010
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