१. ब्राह्मणवाद का दकोसला आ वर्नाश्रित सामाजिक वयावास्ता का खिलाफ आम आदमी के वाणी.२.बौध धरम के महायान सखा के सहजयान साधना के परचार३.विकृति आ भोग के साधना में प्रयोग का कारन सामाजिक प्रतिस्था के विलोप४.दोहा, दोहा-गीत, आ चर्या गीत के रचना आ अनेक काव्य गुण आ प्रकार के शुरुवातनाथ साहित्य (बारहवी से पन्द्रवी शताब्दी):नाथ साहित्य सिद्ध साहित्य आ संत साहित्य के बिच का कड़ी का रूप में आएल बा. सिद्ध साहित्य से संत साहित्य तक प्राय; एके विचारधारा, शैली, एके काव्य रूप, उलटवांसी, सहज जीवन पद्धति, योग-साधना का प्रति आग्रह, पाखंड विरोध, मानवता के प्रतिष्ठा,मन-शुधि, चित-निरोध आदि नाथ संतान के सिधांत आ व्यवहार रहे.नाथ पंथ के प्रमुख साधकं में मत्स्येन्द्र, गोरखनाथ, नागार्गुन,च्र्प्तिनाथ, चौर्गिनाथ,गोपीनाथ, भरथरी आदि प्रमुख बाड़े.१. गोरखनाथ : गोरखनाथ के समय, जन्मस्थान, रचा स्थान, के विविरण प्रमाणिकता के विवाद बा.विद्वान लोग इहाँ के समय लगभग दसवी शताब्दी मानत बाड़े.अइसन मान्यता बा की गोरखनाथ मत्स्येन्द्र, के शिष्य रहलीं.उहाँ के नाव पर चालीश गो हिंदी-भोजपुरी आ छब्बीस गो संस्कृत ग्रन्थ के विवादस्पद विवरण बा.जवान में प्रमुख बा :गोरष-गणेश जपिट,ज्ञानदीप बोधमहादेव गोरष शुस्तिदया बोधसप्तवार, आदिसंस्कृत में उहाँ के रचल २६ ग्रंथन में प्रमुख बासिद्ध सिधांतविवेक मार्तंडशक्ति संगमनिरंगन पूरणवैरथ पुराण, आदिगोरख नाथ का ग्रन्थ से कुछ उदहारण देखल जा सकेला:" हंसिबा बोलिबा रहीबा रंग, काम क्रोध न करीबा संगहंसिबा बोलिबा गईबा गीत, छिद करी रशिबा आपना चिंत"चौरंगी नाथ :सियालकोट के रजा शालिबहन के बेटा चौरंगी नाथ के कुंवा से उद्धार क के गोरख नाथ उनका के मत्स्येन्द्र नाथ के शिष्य बनवाली आ अपना योगबल से उनकर शारीरिक विक्रितियन के दूर कैनी. इहाँ के "प्राण संकली" के रचना के विद्वान लोग भोजपुरी के पहिला कवि मानेलन.उदहारण देख सकेनी:" सत्य वदन्त चौरंगी नाथ आदि आन्तरि सुंनो वृतांतसलिवाहन घरे हमर जनम उपपति, सति माँ झूट बोलिलाआशीर्वाद पईला अम्हे, मने भईला हर्षितहोठ, कंठ, तालुका ए सुकईला धरम न रूप मत्स्येन्द्र नाथ स्वामी.गोपीनाथ:गोपीनाथ के माँ मैनावती गोरखनाथ के शिष्य रहनी.उनका से संवंधित अनेक जनश्रुति प्रचलित बा.गोपी के माई गोपीनाथ के सन्यास लेवे के प्रेणना देली.उहाँ के ऐ गो कविता बा:-" मुकुति मधि मई हम रहे, सेवग सुर न औरजोगी जल रमते भैले रहे न एके वैरसतुगुरु सबद हमारा सर परि वाद-विवाद न कीजैहम जोगी परदेशी मई, भिचावा होई त दीजेभरथरी : " शतक-त्रय" आ "वाक्यप्दियम" के रचएता भरथरी रहनी.
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