Sunday, June 27, 2010

पलायन

पलायन
बाढ़, सुखाढ़ आ रोटी
अजीब रिश्ता बा इनके
जवन खरका देलख
खरई खरई
जीये के विश्वास
साथे रहे के आस
धकेल देलस/ दउरत रेल के डिब्बा में
जहवां न बइठे क जगहे
न साँस लेवे के साँस
ऊँघत/ जागत / दू दू रत के
आँखिन में काटत
जहवां कोई नइखे आपन
बा त एगो टूटल सपना
सहारा बा
उहो बालू के भीत नियन
गरीबी के तराजू में
एक ओरी भूख
दुसर ओरी निराशा
बिच में दू गो लइकन के
सुसकत आँख
दूध क तरसत ओठ
बुढ माई बाबु
अ अदद बीबी
उहो टी. बी. के शिकार
बीमार/लाचार/जियल दुश्वार

इ जिनिगी के भीरी
पलायन के अलावा
कवन चारा बा ?

Wednesday, June 23, 2010

एन.जी.ओ

सबद्कोश के नया शब्द
समाज के स्वस्थ/शिक्षित/परिस्कृत बनावे के साधन
प्रसाधन/ जे कह ल/ जवान कह ल
बड़ा व्यापक बा इ शब्द
जेकर अर्थ भले समझ गइल बिया सरकार
बाकिर/एकर मरम समझे खातिर
धोवे के पड़ी आंखिन से सरम
काहे की एन.जी.ओ. उहे चला
सकेला/ जे धो देले हो/ आंखिन से पानी/आ
फंडिंग के पाछे गला देले हो/आपन जवानी
आखिर बुढ़ापा के खर्चा/ के उठाई
उ त एन.जी.ओ.के/ फंडिंग से त आई
त आव भैया/ मिलजुल के /अ गो एन.जी.ओ.चलावल जाये
आ आपन भविष्य भी सुखद बनावल जाये.
( इ कविता विचार दृष्टी त्रेमासिक पत्रिका में जनवरी-मार्च २०१० में छपल रहे.)

Tuesday, June 22, 2010

गरीबी

जे सोना के चम्मच लेहले जनमल
ऊ का जानि गरीबी का हऽ?
काथी हऽ लाचारी,
बेकारी का हऽ,
काथी हऽ बेमारी?

जेकर जनम
एयर कंडीसन में भईल
ऊ का जानी
पूस के रात का हऽ,
टटाइल भात का हऽ,
का हऽ रोटी झूराइल,
का हऽ भूख से अझुराइल?

जेकरा न कपकपिये बुझाइल
ना जेठ के दुपहरी
ऊ का बुझी गरीबी के शीतलहरी?

जे जनमल महल अटारी में
ओकरा झोपड़ी के पीड़ा का बुझाई?
का बुझाई
बिन छानी छप्पर के दुःख,
फाटल बेवाई के टीस,
अभाव के पुरवाई के खीस?

ओकरा सब हरिअरे लउकेला
काहे की ऊ सोना चानी में छउकेला
ऊ बलि नियर बलवान बा
भगिया के पहलवान बा
तबे नू ओकरा के लोग कहेला
भगवान
ऊ हसेला
आ रोवेला हिंदुस्तान.

Tags: कविता,

उमेद

जरल रोटी
गरहन लागल चान
बाकिर
आस मरल ना
कहियो त होई बिहान
राहू लागले ना रही
हटबे करी
आ भूख के रात
कटबे करी
एही उमेद पर
जिनिगी चलले
करेजा वाला जिएला
डरपोक हाथ मलेला
ओठ झुराला
फाटेला
जेठ के खेत नियर
पाहून के रहिया
देखतनिहारत
दिन कटेला
तरी मिली
कहियो ना कहियो
हरिहरी आई
मन रसगर बनाई
कटगर भइल मनई
के हरखाई
तबले सबुर रखल
जरूरी ह
ए उमेद में
कि रात हरमेस ना रही
भोर अइबे करी
सुतल मन के
जगइबे करी
अन्हरिया केदूदुरइबे करी
तब लगी कि
हियावा पर
गरहन नइखे
बस एही भाव में
जियत रहीं आ
जिनिगी के लुगरी
उमेद के डोरी से सियत रहीं.

Thursday, June 17, 2010

कलयुगी मेहरारू

अब सीता सावित्री लक्ष्मी पार्वती
जइसन नाम
आउटडेटेड हो रहल बा
काहे की अब लोग/
अपना आंख के पानी
अपने धो रहल बा
लाज ओइसही बिलाइल जाता
जईसे गरम तावा पर पानी के एगो बूंद
रेगिस्तान में घडी भर के वरखा
अब आँखिन में सरम के काजर नइखे लागत
बेसरमी के सुरमा लागत बा
पुन्न भागत बा/ पाप जागत बा
अंधरिया के चान नियर/कपडा
घटत जात बा देहीं से
नेह लागत बा जेहि सेही से
पति परमेश्वर के भाव
घटत जाता
बॉय फ्रेंड से नेह/सटल जाता
संस्कार के सुरुज के ग्रहण लागल बा
गुरु सूतल बाड़े/ राहू जागल बा
कहाँ जाई मेहरारूअन के
इ स्वतंत्रता केहू के का बुझाता?
का करबे विधाता
पब में गईला के बहार हो गइल
अपना संस्कृति के बंटाधार
हो गइल
रोकवइया कहतारे/ पुरातनपंथी
आ एह पर बुद्धिजीवी लोगन के
अजबे बा नारा
केशरिया वालन के करानी बा सारा
नइखे लउकत देवी कहायवाली
के चरितार कहाँ, जा रहल बा
उडीस चाटत बा/घुन खा रहल बा
देह के/नेह के
कहे की कम्निष्ठ लोग
दवरी करेला बिना मेह के
(इ कविता "भोजपुरी माटी" कोलकत्ता के अगस्त,२००९ अंक में छपल रहे.)

"नाक बांचल त लाख मिलल

नाक ऊँचे राखीं, देखीं कहीं नाक कट न जाये, नाक के बाल भईल, नाक में दम कईल, न जानी केतना दर्जन मुहाबरा नाक पर लिखील होखी. देश रहो कि ओकर नाक काटो, एकर फिकिर केकरा बा ? देश के नाक उचें राखे खातिर नेता लोग विदेश जालन. जेतने घूमें लें ओतने देश के नाम उचं होत रहेला. ई त बिरोधी दल वाला लोग के स्वारथ ह जे विदेश घुम्वैया नेता लोग के घुम्क्कर कह के उनका धोती प पांकी डालेलन. ई त ध्य्नाबाद बा मिडिया वालन के जे नेता जी लोगन के फोकस में रख के उनकर धुतुन्गा बजावत रहेला लोग. फैदो बा, कबो कबो मिडिया वालन भाई लोग नेता जी के संगे संगे विदेश भ्रमण के मोका पा जालें.आपन नाक बांचल रहे, ऐ खेल में हमनी के राजनेता लोग उ माहिर बा लोग कि ओही लोग के बुद्धि के आगू चाणक्य जी रहते त फिसड्डी हो जईते. देश के नाक उंच रहे एकरा ला अमेरिका के आगू नाक रगडला के में कवनो नोकसान थोड़े बा.
वामपंथी भाई लोग के ई बुझाते नइखे, ना ठाकरे लोग के, ना ममता दीदी के, न नक्श्ली लोगन के.
नाक कटी त प्लास्टिक सर्जरी करा लिहल जाई, तबे नु लोग गावत फिरत बा " उंच नाक वाला तोहरे बोलबाला"
भगवन माफ़ करस ओह आतंकवादियाँ के जे अपना करतूत से जरदारी साहेब के नाक कटवा रहल बा लोग. बेचारा के एगो नाक बा, कबो अमेरिका काटत बा त कबो लन्दन अब चिताम्बरम साहेब कटे में लागल बाड़े. ए कवि के कहनाम बा कि :" जनता खड़ी बाजार में, नाक नाक चिल्लाय, नेता बिनु चिंता करस, नाक रहो कि जाये"
पिछला एकाध साल में अताम्घती हमलावर लोग नाक में दम क देलन, कबो लन्दन, कबो काबुल, कबो इस्लामाबाद, कबो लाहोर, कबो क्रिकेट ग्राउंड, कबो मुंबई के ताज होटल, कबो दिल्ली के सरोजिनी नगर, कबो कनात प्लेस में हमला कर के सरकार के नाक में दम कर देले बा लोग . कबो संसद पर हमला कर के सर्कार के नाक कट देलख लोग.धार्मिक औरी ट्रेन में हमला के आपन नाक उंच कईल लोग.
आज कल नक्सलवादी लोग आपन नाक के लड़ाई लदत बा लोग. उन्हें जन मॉल के सुरक्षा में सरकार आपन नाक बचावे में लागल बिया.देतेवाडा में सेना के गाड़ी उड़ा के, पश्चिम बंगाल में ट्रेन उड़ा के नक्सलवादी लोग सरकार के नाक चापुट कर देले. लेकिन हमनी के बहादुर सेना लोग उ नक्सलीयन के नको चना चबवा रहल बड़े.
नाक कटे और काटे के बखान भी हमनी के शास्त्र, कथा,कहानी में बा. भगवन! हमारा दू चार गो नाक दिहल जाईत त बड़ बढ़िया रहित .एगो कटित त एगो त बचित.उहे लेके हम नाक वाला त कहईती आ गावत फिरती " नाक बांचल त लाख मिलल."
लेखक : संतोष पटेल
संपादक: भोजपुरी जिनिगी.
राष्ट्रीय प्रचार मंत्री: अखिल भारतीय भोजपुरी भासा सम्मलेन, पटना.
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भोजपुरी साहित्य के आदिकाल:
भोजपुरी साहित्य के आदिकाल के आभास आठवी शताब्दी से मिले लागत बा.
१. सिद्ध साहित्य : साधना में निष्णात अलोकिक सीढियाँ से संपन्न आ चमत्कारपूर्ण अति- प्राकृतिक शक्तियां से युक्त व्यक्ति "सिद्ध" कहत रहे.सिद्ध लोग में सरहपा,कुकुरिपा (कपिलवस्तु निवासी) आ तिलोपा के विशेष उल्लेख भोजपुरी साहित्य का प्रशंग में आचार्य हजारी प्रसाद विद्वान किले बा लोग.
२. सरहपा : सरहपा के समय आठवीं नौवी शताब्दी मलाल जला.उहाँ के सिद्ध संप्रदाय के व्यवस्तिथ आ प्रचारित कैली.
३.कुक्कुरिया: इहाँ का कपिल वास्तु के ब्राहमण रहनी.इहाँ के दोहा आ चाय पदन में अपभ्रंश का साथै भोजपुरी के छावाक बा.
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भोजपुरी साहित्य के इतिहास

भोजपुरी साहित्य के इतिहास के क्रमिक आ किस्तवार जानकारी रउरा सभन ला प्रस्तुत बा:
हर साहित्य के एगो सतत परम्परा होला.उ साहित्य के समझे ला आ अध्ययन में सुविधा खातिर ओकर काल विभाजन आ नामकरण के परंपरा बा.
*महाराजा कुमार दुर्गा शंकर प्रसाद सिंह 'नाथ' के अनुसार :-
१.प्रारंभिक अविकसित काल (सिद्ध काल) - सन ७०० से ११०० ई.;
२.आदि काल (ज्ञान प्रचार काल - वीर काल ) - सन ११००-१३२५ ई.;
३.पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल)- सन १३२५-१६५०ई.;
४. उत्तर मध्यकाल (रीति काल) - सन १६५०-१९०० ई.;
५. आधुनिक काल भा राष्ट्रीय काल आ विकास कल - सन १९,०० -१,९५० ई.;
* डॉ. कृष्ण देव उपाध्याय अपना "भोजपुरी भाषा और साहित्य" (१९५४) में भोजपुरी के नामकरण भर कएले बानी १. सिद्ध साहित्य
२.नाथ साहित्य
३.संत साहित्य
४.लोक साहित्य
५. आधुनिक साहित्य
* रास बिहारी पाण्डेय जी अपना "भोजपुरी भाषा क इतिहास" में ई तरीका से काल बिभाजन कएले बानी
१. आरंभिक काल सन ७००-१,१००
२.चारण काल सन ११००-१४००
३.संत काल सन १४००-१८००
४. अध्ययन कल सन-१८००-१९००
५. वर्तमान कल सन १९००- से अब तक यानि की सन १९८० तक
*डॉ. तैअब हुसैन पीड़ित के किताब "भोजपुरी साहित्य के रुपरेखा के अनुसार-
१.प्रारंभिक काल सन ७००-१,१००
२.चारण काल सन ११००-१४००
३.संत काल सन १४००-१८००
४.अध्ययन काल सन-१८००-१९००
५.वर्तमान कल सन १९००- से अब तक यानि की सन २००५ तक
*पंडित गणेश चौबे के अनुसार-
१. संत साहित्य
२.प्रकीर्ण लोककाव्य
३. लोकसाहित्य आ
४.आधुनिक साहित्य
* डॉ. राजेश्वरी शांडिल्य के 'शिष्ट काव्य की रेखा के अनुसार
१.प्रारंभिक काल सन १८५०-१९००
२. चेतना कल सन १९००-१९४७
३. उत्कर्ष कल सन १९४७ से आगे
(साभार " भोजपुरी साहित्य के संक्षिप्त इतिहास " लेखक : नागेन्द्र प्रसाद सिंह, 'भोजपुरी साहित्य के संक्षिप्त' रुपरेखा :लेखक डॉ. तैअब हुसैन पीड़ित आ "भोजपुरी भाषा क इतिहास" लेखक रास बिहारी पाण्डेय )
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सिद्ध साहित्य के विशेषता

१. ब्राह्मणवाद का दकोसला आ वर्नाश्रित सामाजिक वयावास्ता का खिलाफ आम आदमी के वाणी.२.बौध धरम के महायान सखा के सहजयान साधना के परचार३.विकृति आ भोग के साधना में प्रयोग का कारन सामाजिक प्रतिस्था के विलोप४.दोहा, दोहा-गीत, आ चर्या गीत के रचना आ अनेक काव्य गुण आ प्रकार के शुरुवातनाथ साहित्य (बारहवी से पन्द्रवी शताब्दी):नाथ साहित्य सिद्ध साहित्य आ संत साहित्य के बिच का कड़ी का रूप में आएल बा. सिद्ध साहित्य से संत साहित्य तक प्राय; एके विचारधारा, शैली, एके काव्य रूप, उलटवांसी, सहज जीवन पद्धति, योग-साधना का प्रति आग्रह, पाखंड विरोध, मानवता के प्रतिष्ठा,मन-शुधि, चित-निरोध आदि नाथ संतान के सिधांत आ व्यवहार रहे.नाथ पंथ के प्रमुख साधकं में मत्स्येन्द्र, गोरखनाथ, नागार्गुन,च्र्प्तिनाथ, चौर्गिनाथ,गोपीनाथ, भरथरी आदि प्रमुख बाड़े.१. गोरखनाथ : गोरखनाथ के समय, जन्मस्थान, रचा स्थान, के विविरण प्रमाणिकता के विवाद बा.विद्वान लोग इहाँ के समय लगभग दसवी शताब्दी मानत बाड़े.अइसन मान्यता बा की गोरखनाथ मत्स्येन्द्र, के शिष्य रहलीं.उहाँ के नाव पर चालीश गो हिंदी-भोजपुरी आ छब्बीस गो संस्कृत ग्रन्थ के विवादस्पद विवरण बा.जवान में प्रमुख बा :गोरष-गणेश जपिट,ज्ञानदीप बोधमहादेव गोरष शुस्तिदया बोधसप्तवार, आदिसंस्कृत में उहाँ के रचल २६ ग्रंथन में प्रमुख बासिद्ध सिधांतविवेक मार्तंडशक्ति संगमनिरंगन पूरणवैरथ पुराण, आदिगोरख नाथ का ग्रन्थ से कुछ उदहारण देखल जा सकेला:" हंसिबा बोलिबा रहीबा रंग, काम क्रोध न करीबा संगहंसिबा बोलिबा गईबा गीत, छिद करी रशिबा आपना चिंत"चौरंगी नाथ :सियालकोट के रजा शालिबहन के बेटा चौरंगी नाथ के कुंवा से उद्धार क के गोरख नाथ उनका के मत्स्येन्द्र नाथ के शिष्य बनवाली आ अपना योगबल से उनकर शारीरिक विक्रितियन के दूर कैनी. इहाँ के "प्राण संकली" के रचना के विद्वान लोग भोजपुरी के पहिला कवि मानेलन.उदहारण देख सकेनी:" सत्य वदन्त चौरंगी नाथ आदि आन्तरि सुंनो वृतांतसलिवाहन घरे हमर जनम उपपति, सति माँ झूट बोलिलाआशीर्वाद पईला अम्हे, मने भईला हर्षितहोठ, कंठ, तालुका ए सुकईला धरम न रूप मत्स्येन्द्र नाथ स्वामी.गोपीनाथ:गोपीनाथ के माँ मैनावती गोरखनाथ के शिष्य रहनी.उनका से संवंधित अनेक जनश्रुति प्रचलित बा.गोपी के माई गोपीनाथ के सन्यास लेवे के प्रेणना देली.उहाँ के ऐ गो कविता बा:-" मुकुति मधि मई हम रहे, सेवग सुर न औरजोगी जल रमते भैले रहे न एके वैरसतुगुरु सबद हमारा सर परि वाद-विवाद न कीजैहम जोगी परदेशी मई, भिचावा होई त दीजेभरथरी : " शतक-त्रय" आ "वाक्यप्दियम" के रचएता भरथरी रहनी.
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Wednesday, June 2, 2010

"भोजपुरी जिनिगी" भोजपुरी साहित्य के तिमाही पत्रिका ह

"भोजपुरी जिनिगी" भोजपुरी साहित्य के तिमाही पत्रिका ह.इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद्, नई दिल्ली, "पुरवैया" (पंजी.)(पोपुलास अर्बन रुरल वोमन एंड इन्तिग्रतेद अद्लोस्सेंट यूथ एसोसिअसन)नई दिल्ली के भोजपुरी इकाई ह. इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद् के मुखपत्र के रूप में भोजपुरी जिनिगी के पत्रिका निकला जाला.
ई पत्रिका के निकलत दू साल हो गइल बा.आभी नया अंक आ रहल बा.
जवन भोजपुरी के सेक्स्पिअर आदरणीय भिखारी ठाकुर के ऊपर केन्द्रित बा.
एकर संपादन हम करे नी.
भोजपुरी साहित्य के एक एक पहलु के आपना ब्लॉग पर देहब.ररुआ सबन से निहोरा आउर निवेदन बा की आपन विचार के तथ्य परक जानकारी के हमनी के साथै मिले के बातिन.
संतोष पटेल
संपादक
भोजपुरी जिनिगी.

Tuesday, June 1, 2010

भोजपुरी भासा के विकास खातिर साझा प्रयास

आदरणीय भोजपुरिया भाई और बहिन
सादर प्रणाम
उपरोक्त विषय के ऊपर राउर निगाह ले जाये के पीछे हमार का मकसद बा उ बतावे के चाहतानी.
भोजपुरी भासा के क्षेत्रीय पहचान के साथै साथै अंतरराष्ट्रीय पहचान भी बा.
भारत के बिहार, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ औरी झारखण्ड में एकर बोलानिहर, लिखनिहार और पढ़निहार के संख्या करोड़ में बा. उहे दिल्ली, मुंबई, कोलकता, लखनउ,पुणे, जालंधर, सूरत गुडगाँव, जयपुर, और नोर्थ इस्ट में गौहाटी, डिब्रूगढ़ और तीनसुखिया आदि जगहे लाखन में बा.
जहाँ तकले बात बा, अंतरराष्ट्रीय पहचान के बात बा त मारिसस,त्रिदिनाद, सूरीनाम, होलैंड, जमैका, टुबैगो,फिजी, गुनाया, औरी छोट छोट द्विपन जैसे बाली, सुमात्रा औरी वेस्ट इंडियन द्विपन में गइल गिरमिटिया मजदूरन से फैलल आ ससक्त भइल ई भासा के भारत सरकार संबिधान के आठवी अनुसूची में काहे नइखे सामिल करत????
भोजपुरी आन्दोलन से जुडल सब संस्था आपन आपन डपली बजावे में काहे लागल बाड़े ???????
साझा प्रयास काहे ना ???????
आन्दोलन से जुडल सब संस्था क्षेत्रवाद, जातिवाद आउर व्यक्तिवाद से कहे ग्रसित बा ??????
कुछेक संस्था के छोड़ के बाकि संस्था में नेतागिरी जादा कहे बा??????
साहित्य के सृजन करे वाला के ना सरकार ना कोनो संस्था मदद कहे नइखे करत??????
१०-२० लाख रूपया खर्चा संस्था नाच गाना पर खर्चा कर सकेले बाकिर कोनो भोजपुरी साहित्यकार के १० हज़ार के मदद भी ना कहे?????
सवाल कई गो बा ?????
लेकिन हम बरी बरी से राउर विचार चाहेब.