Tuesday, October 22, 2013

जनकवि रामजियावन दास 'बावला' के भोजपुरी कवि "सूखा"

जनकवि रामजियावन दास 'बावला' के भोजपुरी कविता "सूखा" कइसन बा राउर विधान हो विधाता धक्-धक् करेला परान पनियां सपनवा मोहाल बा पतउवा दागि-दागि पेट रही जाले बचउवा छुप गईले केतनन क चान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। डकरेले गोरुवा बताव कहाँ जाई जरत सरेहिया तिरीं कहाँ जाई होई जाई देसवा मसान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। अंसुवा क सिंचल बेइल कुम्हिलाइल केकरे बेसहले विपति अगराइल; झंखत बा खेत-खलिहान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। अगिया लगाय के कवन कल पवले यही महँगाई में चक्कर चलवले "बावला" भईल इन्सान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। (साभार : परास, जनकवि 'बावला' स्मृति अंक, अक्टूबर - दिसंबर 2012, संपादक : डॉ आसिफ रोह्तास्वी)

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