Wednesday, October 23, 2013

महामाया प्रसाद विनोद के एगो भोजपुरी कविता " जिनिगी का ह"

महामाया प्रसाद विनोद के एगो भोजपुरी कविता " जिनिगी का ह" रोअत रात मुस्कात भोर पसेना से तर -तर जेठ के दुपहर। जिनगी का ह? मेहनत- मजदूरी करत टूसीआइल बचपन खिलाल जवानी मुरझाइल बुढ़ापा ह। (महामाया प्रसाद विंडो के भोजपुरी कविता संग्रह " हार गईल बसंत")

डॉ अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा अखिलेश के एगो भोजपुरी कविता " कवन परी ?"

डॉ अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा अखिलेश के एगो भोजपुरी कविता " कवन परी ?" कवन परी उतर गईल रंग में नहा के रूप के तलईया में डुबकी लगा के। चन्दन तन -चम्पई नेह के घरौंदा मनिहारिन लौट गईल रेत के बना के। पाहून गुलाब परदेशी गवरईया भाग गईल आज, कहीं डीठना लगा के। देह के मडईया में, आकुल मन मैना फुदुक फुदुक राह खोजे घेंट उचका के। कवन परी उतर गईल रंग में नहा के रूप के तलईया में डुबकी लगा के। (भोजपुरी कविता संग्रह :चंपा के फुल से साभार)

Tuesday, October 22, 2013

जनकवि रामजियावन दास 'बावला' के भोजपुरी कवि "सूखा"

जनकवि रामजियावन दास 'बावला' के भोजपुरी कविता "सूखा" कइसन बा राउर विधान हो विधाता धक्-धक् करेला परान पनियां सपनवा मोहाल बा पतउवा दागि-दागि पेट रही जाले बचउवा छुप गईले केतनन क चान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। डकरेले गोरुवा बताव कहाँ जाई जरत सरेहिया तिरीं कहाँ जाई होई जाई देसवा मसान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। अंसुवा क सिंचल बेइल कुम्हिलाइल केकरे बेसहले विपति अगराइल; झंखत बा खेत-खलिहान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। अगिया लगाय के कवन कल पवले यही महँगाई में चक्कर चलवले "बावला" भईल इन्सान हो विधाता, धक्-धक् करेला परान। (साभार : परास, जनकवि 'बावला' स्मृति अंक, अक्टूबर - दिसंबर 2012, संपादक : डॉ आसिफ रोह्तास्वी)

रामचंद्र राही के भोजपुरी कविता "कइसे रात बिताई जी"

जाड़ा लागत बाटे कइसे रात बिताई जी केकर अंगनवा में आगि तापे जाई जी। झोपडी त टूटल बाटे एको नइखे टाटी खटिया पुआर नईखे खाली बाटे पाटी बहे पुरवैया त दांत किटकिटाई जी। ओसवा के बूंदवा देहिया कांपवे जी दूजे शीतलहरी मउगत के बुलावे गुदरी से गोड़ तोपी कइसे माथ लूकाई जी। फटही बा धोती कुरता सुईटर ना रजाई धनिया मोर नईहर बाड़ी घरवा नइखे माई दियरी में तेल नइखे कइसे बतिहर जलाई जी। पटवा के अगिया सहल नाही जाला अँखियाँ से लोर बहे करेजवा दुखाला एको दाना अन्न नइखे कइसे भूख मिटाई जी। (साभार :तूरीं ई जंजीर (भोजपुरी लोकगीत संग्रह ) रचनाकार : रामचंद्र राही)