Monday, July 12, 2010

शहरी जिनिगी

ना गंवई माटी के सुगंध बा
ना कही सोन्हाई
ना कोइल के कुहू कुहू बा
ना मुर्गा के बांग
बस बा त कागज के फूल
कागज के माला
कहीं छोटका त कहीं बड़का नाला
तितली के बदले उड़ेले माछी
भिनभिनात / घीन बाटत
बज बज नाली के बदबू
बुझाता/ लील गइल
भाव के ख़ुशबू
मुर्गा के बांग / आ टांग लोग खा रहल बा
एही में का रहन सहन के सुख
पा रहल बा ?
शहरी बाबू लोग बिना चिकन-मटन के
खात नइखे
बिना दारू के नहात नइखे
हवास बा/ तनिके में चान छुवे के
कुछुवो नइखे होखत त
नेतागिरी के सहारा बा
धोखा के गड़हा में सबका के गिरा के
अपने अगुवाए के बा/ हिरअराए के बा
भले केहू मरो/ आपन पेट त भरो
अपनापन मुर्गे नीयर कटा गइल
बाबूजी छोटका में माई बड़का में
रहिहें/ खइहे
बाकिर अपना मन से कतही
ना जइहें
इहे शहरी जिनिगी के हाल बा
कमाल बा / आ हमनी के बूझत बानी
इहे सुख ह/ ना जानी इ विचार
कहाँ ले जाई / का करी
आ आदमी एही में अझुराइल / कबले ले मरीं

5 comments:

  1. संतोष भाई, रउआ गाँव के सरल अउर शुद्ध जिनगी के तुलना शहर के भाग दौड़ वाला जिनिगी से बहुत नीमन से कईले बानी, अब का कहल जाव , शहर के चकाचैंह कुछ अइसन बा कि गाँव के लोग भी वोह में भुला जाता अउर अपने आप के ही भुला जात बा, बहुत ही नीक रचना बा, बधाई सवीकार करी |

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  2. अपनापन मुर्गे नीयन कटा गइल
    बाबूजी छोटका में माई बड़का में
    बंटा गईल


    बहुत बढ़िया संतोष जी

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  3. संतोषजी बहुत ही नीक रचना बा, बधाई स्वीकार करी |

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  4. बहुत बढिया भइया

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