Wednesday, February 2, 2011

ग़ज़ल

आसा नायारण प्रसाद 'अशोक' के एगो ग़ज़ल

दर्द में अब का कवनो दवा काम दी ?
विष भरल बह रहल का हवा काम दी ?

केतना टुकड़ा भइल आजू दिल के ईहाँ
तोपअ चेहरा का अब आईना कम दी ?

राउर दुअरा पर खडी आईल टूटल कमर
के तरे सोंच लीं जी दुआ काम दी ?

तार नेहिया के टूटल सगर मोड़ पर
अब पराइल का का आसरा काम दी ?

होके गुमनाम कतहूँ गुजारे परल
वक्त, मितवा के का दुअरा काम दी ?

(आदरणीय अशोक जी रेशम कोठी, वीर गंज-६, नेपाल में रहेनी)

पाण्डेय कपिल जी के एगो ग़ज़ल

अब त जियल पहाड़ लागत बा
काहे जिनिगी उजाड़ लागत बा

काहे अपनन से केहू बतियावो
एहूँ अंगना में बाड़ लागत बा

का करो ई चना, अकेला बा
तनिको फूटल ना भाड़ लागत बा

बंद बा हो रहल गईल - आईल
बीच राहे प झाड लागत बा

झर रहल बा जहें - तहें ओढना
एही मौसम में जाड लागत बा
(साभार : पाण्डेय कपिल के ग़ज़ल संग्रह 'परिंदा उड़ान पर' ग़ज़ल संग्रह से, पाण्डेय कपिल जी के आवास, भोजपुरी संसथान, ३/९, इन्द्रपुरी, पटना - २४)

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