आसा नायारण प्रसाद 'अशोक' के एगो ग़ज़ल
दर्द में अब का कवनो दवा काम दी ?
विष भरल बह रहल का हवा काम दी ?
केतना टुकड़ा भइल आजू दिल के ईहाँ
तोपअ चेहरा का अब आईना कम दी ?
राउर दुअरा पर खडी आईल टूटल कमर
के तरे सोंच लीं जी दुआ काम दी ?
तार नेहिया के टूटल सगर मोड़ पर
अब पराइल का का आसरा काम दी ?
होके गुमनाम कतहूँ गुजारे परल
वक्त, मितवा के का दुअरा काम दी ?
(आदरणीय अशोक जी रेशम कोठी, वीर गंज-६, नेपाल में रहेनी)
पाण्डेय कपिल जी के एगो ग़ज़ल
अब त जियल पहाड़ लागत बा
काहे जिनिगी उजाड़ लागत बा
काहे अपनन से केहू बतियावो
एहूँ अंगना में बाड़ लागत बा
का करो ई चना, अकेला बा
तनिको फूटल ना भाड़ लागत बा
बंद बा हो रहल गईल - आईल
बीच राहे प झाड लागत बा
झर रहल बा जहें - तहें ओढना
एही मौसम में जाड लागत बा
(साभार : पाण्डेय कपिल के ग़ज़ल संग्रह 'परिंदा उड़ान पर' ग़ज़ल संग्रह से, पाण्डेय कपिल जी के आवास, भोजपुरी संसथान, ३/९, इन्द्रपुरी, पटना - २४)
Wednesday, February 2, 2011
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment