कवन परी ?????
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
चन्दन तन- चम्पई,
नेह के घरौंदा
मनिहारिन लौट गइल
रेट में बना के
पाहून गुलाब
परदेशी गवरईया
भाग गइल आज
कहीं डिठना लगाके
देह के मडईया में
आकुल मन मैना
फुदुक फुदुक राह खोजे
घेंट उचका के
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
(साभार : "चंपा के फुल" )
(स्वर्गीय डॉ. अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा "अखिलेश" के जनम मेहसी पुरबी चंपारण में भेल रहे, बाकि सारा जीवन बेतिया में गुजर देनी. हिंदी औरी भोजपुरी के कवि, लेखक औरी पत्रकार अखिलेश जी दैनिक नवरास्त्र के सम्पादकीय बिभाग में रहल अबनी. ईह्हा के मौजी राम के डायरी लेख बड़ा मसहुर रहे.)
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