Wednesday, February 2, 2011

ग़ज़ल

स्वर्गीय पाण्डेय आशुतोष जी के एगो ग़ज़ल


रात के बाद निहिचित बा दिन होई
हो सकेला की उगतो किरिन होई

साथ देहल कठिन ह अंहरिया के
उ टाहाटह अंजोरिया त फेनु होई

देखींल सींत अरुआ के पतइन पर
लोर का ह, ई बतिया यकीन होई

गीत सुनला, सुनवला से होला दरद
बिनु दरद के त जियल कठिन होई

कवनो कवनो तरह चल रहल साँस
के बताई की कब इ उरिन होई

( पाण्डेय आशुतोष जी हिंदी आ भोजपुरी के सशक्त हस्ताक्षर रहीं. ईहा के मलकौली, बगहा, प. चंपारण, बिहार में घर बा. ईहा के भोजपुरी के पत्रिका " पुरवैया" डाइजेस्त के प्रकाशन आ संपादन कइनी. मंच से ईहा के खूब सराहना बटोरनी . भारत के सयदे कोनो मंच होखे जहाँ आपन हिंदी आ भोजपुरी के रचना ना सुनवले होखम.)

बैदेही सरन बनियापुरी के एगो ग़ज़ल

कइसे बताई दर्द हम अंखियन का लोर के
के ले गइल क्रेज के क्न्ख्वा खंखोर के

कतना बनल आकाश में असरा के ताजमहल
पर बुझ गइल चिराग अब सोहिला सहोर के

पपनी के पीर बढ़ गइल प्रीतम के गाँव में
देखल गुनाह हो गइल बेखम चकोर के

कस्ती डूबल स्नेह के सन्देश झील में
सपना सहेजल जल उठल सावन का भोर के

जिनगी जवान नहाके जंजाल में फंसल
अब कब तलक बइठल रहब रहिया अगोर के

बेसब्र दिल के इम्तिहान का कोई करी
तोहफा में दर्द बा मिलल आंसू चभोर के

(कवि : श्री बैदेही सरन बनियापूरी, बनियापुर, सारण निवासी बानी.)

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