Sunday, January 22, 2012

"भोजपुरी के आधुनिक भाषा शास्त्र (भाषा विज्ञानं)" के लेखक हिंदी आ भोजपुरी के विख्यात भाषा शास्त्री, विद्वान डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह जी बानी. असल में ई किताब प्रो. प्रसाद के किताब ' भोजपुरी के भाषाशास्त्र के परिवर्धित रूप ह. भोजपुरी भाषा शास्त्र पर अधिकांश काम अंग्रेजी आ हिंदी में भइल बा. डॉ. ग्रियर्सन, सुनीति कुमार चटर्जी, उदयनारायण तिवारी, रामदेव त्रिपाठी, रामबख्श मिश्र आदि के कम एही दुनो भसन में में बा. राजेंद्र प्रसाद सिंह के भी मूल कम हिंदी में भइल बा बाकिर जीतेन्द्र वर्मा के प्रयास से ई भोजपुरी में भी आइल.
किताब के सम्पादकीय भोजपुरी भाषा के मानकीकरण पर केन्द्रित बा. भोजपुरी हिंदी के नीचका बा आ हर भाषा के स्वरुप बदलत रहेला. खाँटी भाषा के नाव पर स्वाभाविक रूप से भाषा में होत परिवर्तन के रोकाला से भाषा के विकास बाधित होला. ' भाषा बहत नीर ह' एह में बदलाव के कई गो कारन होला जैसे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक कारक होला.
भोजपुरी बोली भर नईखे रह गइल. ई अब खाली गीत-गवनई के भाषा नईखे रह गइल. अब ई विचार आ शास्त्र के भाषा बन चुकल बिया.जल्दिये शासन-प्रशासन, ज्ञान-विज्ञानं आदि के भी भाषा बनी. अइसन स्तिथि में एकरा खातिर देवनागरी लिपि के कवनो, अक्षर, संयुक्ताक्षर भा मात्रा के छोडल ठीक ना होई. एह से अभिव्यक्ति में कठिनाई होई.
जवना चीज खातिर भोजपुरी में शब्द बा नि;संदेह ओकरा के अपनावे के चाहीं बाकिर हिंदी, अंग्रेजी आ अउरो कवनो भाषा के शब्दन के भोज्पुरियावे के फेर में ओकर वर्तनी बिगाडल ठीक नईखे.जरुरत पडला पर दोसर भाषा के शब्दन के बेहिचक अपनावे के चाहीं.एह से भोजपुरी समृद्ध होई. बंगला, मैथली ईहे कइले बा. एह से भोजपुरी के विकास होई. अंग्रेजी के समृधि के एगो बडहन वजह ईहो बा कि उ अपना जरुरत के मुताबिक कवनो भाषा के शब्दन के अपना लेले.

Saturday, January 21, 2012

भोजपुरी कविता : पडोसी
दुःख: के दरियाव में / जे बनत रहे
पतवार / खेवनिहार
आजू का भइल ओह बेवहार में
बुझाते नइखे / हमार पडोसी
अब चिन्हाते नइखे
लागत बा / ओकरो हवा लागल बा
गुमान के
ना काका कहेला / ना भईया
दिनभर गीनत रहे ला रोपईया
चुपचाप / आवेला / चुपचाप जाला
केवाड़ी ओठंगा के खाला
कमरी ओढ़ के घी पियेला
अपने में मरेला / अपने में जिएला
उ जे कबो बिना नून मरीचा मंगले
ना खात रहे / ना तियाना तरकारी
पहुचावे में लजाये / आधा अपने खाए
हमरो के आधा खिआवे
आज बोलते नईखे
मुंह खोलते नईखे
हमार पडोसी
नेह सनेह के दुआर पर / परहेज के
ईटा धरि दिहले बा / ना ताकेला
ना झाकेला / हमार फिकिर बईठल ब
ओकर भाव चढ़ल बा
लागत बा पडोसी के परिभाषा बदल जाई
विश्वास के देवाल ढह जाई
नेह के डेहरी भहर जाई
टूट जाई परेम के डोरी
त का ! शब्दकोष से पडोसी
शब्द ओरा जाई ?
के रही दुख: में
धरनीहार
सुनानिहार
हे भगवान !
(मौलिक : हमार रचना )

Wednesday, January 18, 2012

भोजपुरी के कविता "हँसी"

हँसल नीक ह / दवाई ह
ना जानी जे / केतना बेमारी
हंसले से ठीक हो जाला
जैसे सुरुज के हंसले
भाग जाला अंधरिया
चनरमा के हंसले फइल जाला
अंजोरिया
तना जाला
रेशमी चादर / चांदनी के
धरती के साथ पर / असही
हमरा गाँव में हँसी के बड़ा मोल बा
भईया के बिआह में
भतीजा के छट्ठीहार में
होली के महिना में
पीपल के निचे
चबूतरा पर
जब हँसी के फुहार छुटेला
त टूट जाला रसरी
मइल मन के
झर जाला काई
पुरान दुशमनी के
बाकिर शहरिया हँसी
जहरीला ह
लोग एक दोसरा पर हँसेले
ईर्ष्या में धंसेले
ओह बेरा त अउर
जब पडोसी कवनो दुःख में फंसेले
हंसियो के अजबे रूप बा
खने में नीमन / खने में कुरूप बा
बेसी हंसला पर गोली चलेला
बाकिर शहरे में
जहवा हँसल जला कम
हँसी उडावल जाला जड़े
गरीब पर / गरीबी पर
ईमानदार पर / सोझिया पर
तब
हमार मन कहेला
अच्छा बानी गांवे में
पीपर के छावें में
जहवा किरिनिया के हँसी में
बिहँसेला हमार चारू पहर ..... संतोष पटेल
(२०१२ के पहिला रचना : मौलिक और अप्रकाशित)

Tuesday, October 4, 2011

भोजपुरी कविता "शहर"

भोजपुरी कविता "शहर"

लमहर शहरिया के

ऊँची अटारी

जवना के ईटा ईटा बेमार बा

झूठ के बेमारी से

पथ्थल के माकन में

धोखा के दोकान

बेचवईया/ कठकरेज

लूटे में ना तनिको परहेज

एही में कहीं लुकाईल बाडे

कलुवा/ ललुवा

चोकट/ धरिछन /संकटा

जेकर हियाव रहे दरियाव नियर

आधा बाँट के खाय लोग

दुःख सुख में

धधा के परे लोग

एक दोसरा के खातिर

कंकरीट के जंगल में

ना जाने कहवां दबाईल बा सभे

भुलाईल बा सभे आकि

शहरुवा चाल के जाल में

फंस गइल लोग

ना जानी

केतना धंस गइल लोग

ईहवा आके

( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )

भोजपुरी कविता "शहर"

भोजपुरी कविता "शहर"

लमहर शहरिया के

ऊँची अटारी

जवना के ईटा ईटा बेमार बा

झूठ के बेमारी से

पथ्थल के माकन में

धोखा के दोकान

बेचवईया/ कठकरेज

लूटे में ना तनिको परहेज

एही में कहीं लुकाईल बाडे

कलुवा/ ललुवा

चोकट/ धरिछन /संकटा

जेकर हियाव रहे दरियाव नियर

आधा बाँट के खाय लोग

दुःख सुख में

धधा के परे लोग

एक दोसरा के खातिर

कंकरीट के जंगल में

ना जाने कहवां दबाईल बा सभे

भुलाईल बा सभे आकि

शहरुवा चाल के जाल में

फंस गइल लोग

ना जानी

केतना धंस गइल लोग

ईहवा आके

( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )

भोजपुरी कविता "शहर"



लमहर शहरिया के

ऊँची अटारी

जवना के ईटा ईटा बेमार बा

झूठ के बेमारी से

पथ्थल के माकन में

धोखा के दोकान

बेचवईया/ कठकरेज

लूटे में ना तनिको परहेज

एही में कहीं लुकाईल बाडे

कलुवा/ ललुवा

चोकट/ धरिछन /संकटा

जेकर हियाव रहे दरियाव नियर

आधा बाँट के खाय लोग

दुःख सुख में

धधा के परे लोग

एक दोसरा के खातिर

कंकरीट के जंगल में

ना जाने कहवां दबाईल बा सभे

भुलाईल बा सभे आकि

शहरुवा चाल के जाल में

फंस गइल लोग

ना जानी

केतना धंस गइल लोग

ईहवा आके

( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )

Wednesday, February 2, 2011

डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के व्यंग आलेख "दोआह"

शब्द शब्द के मोल समय के संगे घटेला भा बढेला. एगो उहो दिन रहे जब केहू के दोआह कह दी त बुझीं कि उ मुंह भमहोर ली बाकिर आजू उ दीं आइल कि जवन क्रेज दोआह के बा उ कुंवर के कहाँ? बड़का बड़का कुंवार लइका लोग दोआह के आगू झाल बजावत बाड़े बाकिर थाह ना लागल कि आखिर कवन हवा बहल बा कि सब कुंवारिन दोआहे पर लुभाइल बाडी . अब दोआह कहला पर केहू कोहनात नईखे बलुक मने मने हुलास के लड्डू फोरत बा . जब से फिलिम में कुंवारी लोग दोआह पर मोहाइल बा, लागत बा कि ई शब्दवे सेलिब्रेटी हो गइल बा . लागत बा कि दोआह अब खोजलो से ना मिलिहें आ मिलिहें त कइसे ?

करीना कपूर मोहाइल बाड़ी त सैफ अली खान पर, उहो दोआह, श्री देवी आपन जान लुटवली त बोनी कपूर पर उहो दोआह ..... किरण राव के आमिर कहाँ भेंटइले उहो दोआह, एगो आ दू गो होखे तब नू ईहाँ त दोआह के लाइने लागल बा. हेमाजी के धरमेंदर भेटइले त उहो दोआह आ करिश्मा कपूर जी के पूछबे मत करीं उन्कारो भाग में दोआहे दूल्हा लिखल रहलें. अब ई कुल्ही के , का रहस्य बा ई त केहू लाल बुझककड ही बताई बाकिर सब किछु मिला जुला के, हिला डोला के कहल जा सकत बा कि अब दोआहे के दीं बहुरे वाला बा. ई खे में हमरा अब तनको अजुर नइखे कि हमहूँ दोआहे बानी. अब देखे के बा कि कब ले केहू हमरा पर मरे मिटे आवत बा ओइसे हम टी.वी. आ अख़बार में विज्ञापन दे देले बानी कि हम बिना दहेज के बिआह में विश्वास राखी ला किनहूं के छव गो आ आठ गो बाडी के पेक्स होई हमरा दस गो बाडी पेक्स बा. एह सब गुण का साथे हम देहरादून में रहत बानी जेकरा हमरा पर मेहरबान होखे के बात हो जाये काहे कि एकर कवनो ठेकान नईखे कि कब सरकार

दोआह के बियाह पर रोक लगा दी. ई केहू नईखे जानत काहे कि कई गो नेता आ मंत्री दोआह बाड़े पहिले ओह

लोगिन के भाग फ़रिया जाई तब नू हमार नंबर आई. नंबर त अईबे करी हमरा पूरा विश्वास आ भरोसा बा. ई भरोसा काहे न रही जब सउंसे देशवे भगवन भरोसा पर बा त हमनी दोआह काहे ना रहब, बुझनी नू. आ न

बूझनी त बुझी कि राजनीतियो दोआह होले आ राजनेता भी. जवन नेता दू गो पति में घूम लिहले त का उ दोआह ना भइले ? एह बेरा देखि त दोआहे के भाव बा कुंवर लोग त गजरा मुरई भइल बा बाकिर सेंसेक्स उंच बा त दोआहे के