Tuesday, October 4, 2011
भोजपुरी कविता "शहर"
लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के माकन में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाडे
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवा आके
( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment