भोजपुरी कविता : पडोसी
दुःख: के दरियाव में / जे बनत रहे
पतवार / खेवनिहार
आजू का भइल ओह बेवहार में
बुझाते नइखे / हमार पडोसी
अब चिन्हाते नइखे
लागत बा / ओकरो हवा लागल बा
गुमान के
ना काका कहेला / ना भईया
दिनभर गीनत रहे ला रोपईया
चुपचाप / आवेला / चुपचाप जाला
केवाड़ी ओठंगा के खाला
कमरी ओढ़ के घी पियेला
अपने में मरेला / अपने में जिएला
उ जे कबो बिना नून मरीचा मंगले
ना खात रहे / ना तियाना तरकारी
पहुचावे में लजाये / आधा अपने खाए
हमरो के आधा खिआवे
आज बोलते नईखे
मुंह खोलते नईखे
हमार पडोसी
नेह सनेह के दुआर पर / परहेज के
ईटा धरि दिहले बा / ना ताकेला
ना झाकेला / हमार फिकिर बईठल ब
ओकर भाव चढ़ल बा
लागत बा पडोसी के परिभाषा बदल जाई
विश्वास के देवाल ढह जाई
नेह के डेहरी भहर जाई
टूट जाई परेम के डोरी
त का ! शब्दकोष से पडोसी
शब्द ओरा जाई ?
के रही दुख: में
धरनीहार
सुनानिहार
हे भगवान !
(मौलिक : हमार रचना )
Saturday, January 21, 2012
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