भोजपुरी कविता "शहर"
लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के माकन में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाडे
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवा आके
( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )
Tuesday, October 4, 2011
भोजपुरी कविता "शहर"
भोजपुरी कविता "शहर"
लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के माकन में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाडे
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवा आके
( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )
लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के माकन में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाडे
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवा आके
( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )
भोजपुरी कविता "शहर"
लमहर शहरिया के
ऊँची अटारी
जवना के ईटा ईटा बेमार बा
झूठ के बेमारी से
पथ्थल के माकन में
धोखा के दोकान
बेचवईया/ कठकरेज
लूटे में ना तनिको परहेज
एही में कहीं लुकाईल बाडे
कलुवा/ ललुवा
चोकट/ धरिछन /संकटा
जेकर हियाव रहे दरियाव नियर
आधा बाँट के खाय लोग
दुःख सुख में
धधा के परे लोग
एक दोसरा के खातिर
कंकरीट के जंगल में
ना जाने कहवां दबाईल बा सभे
भुलाईल बा सभे आकि
शहरुवा चाल के जाल में
फंस गइल लोग
ना जानी
केतना धंस गइल लोग
ईहवा आके
( संतोष कुमार: हमार भोजपुरी के नईकी कविता से )
Wednesday, February 2, 2011
डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के व्यंग आलेख "दोआह"
शब्द शब्द के मोल समय के संगे घटेला भा बढेला. एगो उहो दिन रहे जब केहू के दोआह कह दी त बुझीं कि उ मुंह भमहोर ली बाकिर आजू उ दीं आइल कि जवन क्रेज दोआह के बा उ कुंवर के कहाँ? बड़का बड़का कुंवार लइका लोग दोआह के आगू झाल बजावत बाड़े बाकिर थाह ना लागल कि आखिर कवन हवा बहल बा कि सब कुंवारिन दोआहे पर लुभाइल बाडी . अब दोआह कहला पर केहू कोहनात नईखे बलुक मने मने हुलास के लड्डू फोरत बा . जब से फिलिम में कुंवारी लोग दोआह पर मोहाइल बा, लागत बा कि ई शब्दवे सेलिब्रेटी हो गइल बा . लागत बा कि दोआह अब खोजलो से ना मिलिहें आ मिलिहें त कइसे ?
करीना कपूर मोहाइल बाड़ी त सैफ अली खान पर, उहो दोआह, श्री देवी आपन जान लुटवली त बोनी कपूर पर उहो दोआह ..... किरण राव के आमिर कहाँ भेंटइले उहो दोआह, एगो आ दू गो होखे तब नू ईहाँ त दोआह के लाइने लागल बा. हेमाजी के धरमेंदर भेटइले त उहो दोआह आ करिश्मा कपूर जी के पूछबे मत करीं उन्कारो भाग में दोआहे दूल्हा लिखल रहलें. अब ई कुल्ही के , का रहस्य बा ई त केहू लाल बुझककड ही बताई बाकिर सब किछु मिला जुला के, हिला डोला के कहल जा सकत बा कि अब दोआहे के दीं बहुरे वाला बा. ई खे में हमरा अब तनको अजुर नइखे कि हमहूँ दोआहे बानी. अब देखे के बा कि कब ले केहू हमरा पर मरे मिटे आवत बा ओइसे हम टी.वी. आ अख़बार में विज्ञापन दे देले बानी कि हम बिना दहेज के बिआह में विश्वास राखी ला किनहूं के छव गो आ आठ गो बाडी के पेक्स होई हमरा दस गो बाडी पेक्स बा. एह सब गुण का साथे हम देहरादून में रहत बानी जेकरा हमरा पर मेहरबान होखे के बात हो जाये काहे कि एकर कवनो ठेकान नईखे कि कब सरकार
दोआह के बियाह पर रोक लगा दी. ई केहू नईखे जानत काहे कि कई गो नेता आ मंत्री दोआह बाड़े पहिले ओह
लोगिन के भाग फ़रिया जाई तब नू हमार नंबर आई. नंबर त अईबे करी हमरा पूरा विश्वास आ भरोसा बा. ई भरोसा काहे न रही जब सउंसे देशवे भगवन भरोसा पर बा त हमनी दोआह काहे ना रहब, बुझनी नू. आ न
बूझनी त बुझी कि राजनीतियो दोआह होले आ राजनेता भी. जवन नेता दू गो पति में घूम लिहले त का उ दोआह ना भइले ? एह बेरा देखि त दोआहे के भाव बा कुंवर लोग त गजरा मुरई भइल बा बाकिर सेंसेक्स उंच बा त दोआहे के
करीना कपूर मोहाइल बाड़ी त सैफ अली खान पर, उहो दोआह, श्री देवी आपन जान लुटवली त बोनी कपूर पर उहो दोआह ..... किरण राव के आमिर कहाँ भेंटइले उहो दोआह, एगो आ दू गो होखे तब नू ईहाँ त दोआह के लाइने लागल बा. हेमाजी के धरमेंदर भेटइले त उहो दोआह आ करिश्मा कपूर जी के पूछबे मत करीं उन्कारो भाग में दोआहे दूल्हा लिखल रहलें. अब ई कुल्ही के , का रहस्य बा ई त केहू लाल बुझककड ही बताई बाकिर सब किछु मिला जुला के, हिला डोला के कहल जा सकत बा कि अब दोआहे के दीं बहुरे वाला बा. ई खे में हमरा अब तनको अजुर नइखे कि हमहूँ दोआहे बानी. अब देखे के बा कि कब ले केहू हमरा पर मरे मिटे आवत बा ओइसे हम टी.वी. आ अख़बार में विज्ञापन दे देले बानी कि हम बिना दहेज के बिआह में विश्वास राखी ला किनहूं के छव गो आ आठ गो बाडी के पेक्स होई हमरा दस गो बाडी पेक्स बा. एह सब गुण का साथे हम देहरादून में रहत बानी जेकरा हमरा पर मेहरबान होखे के बात हो जाये काहे कि एकर कवनो ठेकान नईखे कि कब सरकार
दोआह के बियाह पर रोक लगा दी. ई केहू नईखे जानत काहे कि कई गो नेता आ मंत्री दोआह बाड़े पहिले ओह
लोगिन के भाग फ़रिया जाई तब नू हमार नंबर आई. नंबर त अईबे करी हमरा पूरा विश्वास आ भरोसा बा. ई भरोसा काहे न रही जब सउंसे देशवे भगवन भरोसा पर बा त हमनी दोआह काहे ना रहब, बुझनी नू. आ न
बूझनी त बुझी कि राजनीतियो दोआह होले आ राजनेता भी. जवन नेता दू गो पति में घूम लिहले त का उ दोआह ना भइले ? एह बेरा देखि त दोआहे के भाव बा कुंवर लोग त गजरा मुरई भइल बा बाकिर सेंसेक्स उंच बा त दोआहे के
भोजपुरी के पुरोधा कवि : शिव प्रसाद किरण
भोजपुरी साहित्य आकाश के दमकत सूरज के नाम रहे कवि शिरोमणि शिव प्रसद 'किरण' . आजमगढ़ (उ.प.) में जन्म लेवे वाला आ बेतिया (बिहार) के आपन करमभूमि बनावे वाला किरण जी भोजपुरी कविता, गीत, ग़ज़ल के एगो लमहर नाम त रहबे कइलन, हिंदी जगत भी उनका के ओतने आदर आ सम्मान देत रहे.
२२ फ़रवरी १९२२ के दिन पिता सरयुग राम चौधरी आ माता भीखइन देवी के अंगना में जब ई बालक के अहिल्का रोअयाई सुनाई दिहलस, तब के जानत रहे की साक्षात् भगवन शिव के कल्याण भव लेके आवे वाला ई लइका शिव प्रसाद 'किरण' बन जाई आ भोजपुरी यात्रा में मिल के पत्थर मानल जाई.
एकदम गरीब आ पीछडल परिवार में जन्म लेवे वाला किरण जी लगे केहू 'गाड फादर' टाइप के आदमी ना रहे जे उनका के आगाड़ी बढ़ावे खातिर आपन पहुच आ पैरवी के इस्तेमाल ना कर सके. जवान कुछ थाती रहे, उ रहे उनकर आपन प्रतिभा, माता सरस्वती के आशीर्वाद के धन आ भोजपुरी खतिर कुछ कर देवे के लगन.
कलम के साधक किरण जी मूल रूप से कर्मयोगी रहनी. आजीविका खातिर जूता बनके बेचल आ साहित्य सेवा खातिर कलम चलावल - दुनु में सामान रूप से सफल रहनी. अभाव त बहुते रहे, जैसान की एगो पीछडल परिवार में रहेला बाकिर उ अभाव उनका आगे बढे में कबहूँ रोड़ा न बनल.
एह सिद्ध कवि के देवासन २ मार्च २००९ के भइल. आजू उहाँ के परिवार में दू गो बेटा, पतोह नाती पोता से भरल बाते, त आई किरण जी के चमक कहवा तकले रहे, केतना रहे, एकरा बारे में देखावल जाव.
सुरुवात करत बानी साहित्यिक संस्था के बनावे के उहाँ के भागीदारी से. बेतिया में जेतना साहित्यिक संस्था बने, किरण जी के आसिरबाद उ संस्था के जरूर मिले. उ संस्था हिंदी के होखे, उर्दू के होखे भा भोजपुरी के होखे, किरण जी रहला के मतलब रहे, उ संस्था के एगो अभिभावक आ सेवक दुनु एके साथ मिल गइल. आज बेतिया में एगो साहित्यिक संस्था बा 'अदबी संगम' जेकर शुरुवाती नाम ' भारतीय बज्मे सुखन' रहे एह संस्था के जवन बगइचा तईयार करे में किरण जी आ उहाँ के साहित्यिक परम मित्र नाजिम भारती जी आपन खून पसीना के एक एक बिरवा के सिचई कइनी. आजू उ मह मह करके महक रहल बा. एक संस्था से किशोरीलाल अंशुमाली, एम.एम. वफा, मंजर सुल्तान, क्रेक बेतियाबी, ए.के. नस्तर जईसन कवि शायर रूपी फुल आजू साहित्य जगत के खजाना बाड़े. एकर अलावा 'जिला साहित्यकार संगम' के बनावे में उहाँ के जी तोड़ प्रयास से रामचंद्र राही , जगत भूषण राज, रविद्र रवि, प्रीतम बावरा जईसन नया कलमकार आपन पहचान बनावे में लागल बाड़े. जिला हिंदी साहित्य सम्मलेन, साहित्य कला संगम, अखिल भारतीय भोजपुरी भासा सम्मलेन जईसन कई गो संस्था से उहाँ के जुडल रहीं.
किरण जी के प्रतिभा के इज्जत सगरे साहित्य जगत रहे, ई बात के सबूत बाटे उहाँ के मिले वाला कई गो सम्मान आ पुरस्कार. उहाँ के जवन जवन संस्था सम्मान दिहलस ओकर नाम रहे - भारतीय साहित्य परिषद्, रामकोला, देवरिया, उ.प., रविदास साहित्य परिषद्, एकमा, सरन, चंपारण जिला हिंदी साहित्य सम्मलेन, बिहार, विधार्थी साहित्य संगम (बेतिया, बिहार), युवा साहित्यकार परिषद(पटना, बिहार), नेपाली भोजपुरी साहित्य कला परिषद्, नेपाल, अखिल भारतीय दलित साहित्य परिषद् दिल्ली, भिखारी ठाकुर भोजपुरी साहित्यकार परिषद्, सकल डीहा, संत रविदास अम्बेडकर विचार मंच (बेतिया), आदि. सांच पूछी त ई सारा संस्था किरण जी के सम्मान देके अपना के सम्मानित कइलस, काहे से की सूरज भगवन के जल ढरला से ढारे वाला के ही कल्याण होला ना की सूरज भगवन के.
जहाँ तक रचना संसार के सवाल बाटे, किरण जी जबले जीअल रहनी, भोजपुरी रचना संसार उहें के नींद से जगत रहे आ उहे के नींद से सूतत रहे, भोजपुरी के हर रचनाकार खतिर किरण जी के निवास तीरथ स्थान से कम न रहे. उहाँ के भी आपन रचना धर्मी होखे के धरम पूरा ईमानदारी से निभवनी. भोजपुरी लिखेवाला के त तरह से उत्साहित करत रहनी की जैसे उ रचनाकार कवनो आपन सगा सम्बन्धी होखे भा ओकरा से खून के रिश्ता होखे. कवि सम्मलेन में त उहाँ के मंच पर रहला के मतलब रहे की श्रोता लोगन के भरपूर मानसिक खुराक मिलबे करी. का मधुर आवाज, का पड़े के अंदाज, आ सबदन के केतना सटीक आ मारक प्रोयोग, सुनेवाला त गदगद हो जाट रहे. कबो कबो त हालत ई बन जाट रहे की संचालक किरण जी के सबसे अंत में एह से बोलावत रहे ताकि श्रोता के संख्या अंत तक बनल रहे. खाड़ी के कुरता पईजमा पहिनले सवार रंग के अगो किरण जी के मुंह से भोजपुरी के किरिन फूटे त कवि सम्मलेन के पंडाल में एगो अद्भुत आभा बिखर जात रहे. मंचन पर बड़का बड़का नाम उहाँ के साथ काव्य पाठ कर के अपना के बडभागी समझे. १९५० मे उहाँ के आ मंच के आजू के भोजपुरी के लमहर नाम अनिरुद्ध जी के साथै काव्य पाठ कइले रहनी. ई उहे अनिरुद्ध जी हई जिनकर मशहूर गीत ह " एक घडा माथे पर धइली, दूजा चढ़ल कमरिया" अब रउरा सोचत सके नि की जब दू गो दिग्गज मंच पर आपन भोजपुरी के तीर छोडले होईहे त श्रोता के का हल भइल होई. उहे अनिरुद्ध जी के जब भेट २००५ में कविवर डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना से भइल त किरण जी के बारे में ढेर सवाल आ उहाँ के हल-चाल पूछ बईठनि त ई रहे किरण जी के प्रभाव की ५५ साल के बड़ो कवनो लमहर कवि उहाँ के याद रखले रहे.
आकाशवाणी से किरन जी दर्जनों बार काव्य पाठ कइले रहली. भोजपुरी क्षेत्र के लोग त एह दिन के बाट जोहे की कहिया रेडियो स्टेशन से किरण जी के रसगर आवाज सुनाई दी.
रचना छपे के मामला में किरण जी बहुत आगे रहनी. हिंदी आ भोजपुरी में कई गो स्थानीय पत्र-पत्रिका में छ्पला के अलावा आर्यावर्त, प्रदीप जईसन प्रतिष्टित हिंदी दैनिक में भी छप चुकल बानी. उहाँ के आपन प्रकाशित पुरस्तक रहे " भोजपुरी के नये गीत आ गीतकार", "भोजपुरी कविता कुञ्ज", "माटी के बोली", 'आजादी के सपने' , रिमझिम, घायल गीत, सिसकते सरगम आदि.
अब आई, किरण जी के कुछु भोजपुरी रचना के मिठास लिहल जाव. शुरुवात करत बानी हम उ रचना से जवन सबसे जादा लोग सुनले बा आ उहाँ के पहिचान बनल. उ रचना रहे एगो ग़ज़ल जवना के गोरखपुर आकाशवाणी त न जाने केतना बेर प्रसारित कइलस. तनि देखि उ ग़ज़ल के :-
" रउआ हंस दी त भोर हो जाई
सगरो अंगना अंजोर हो जाई
नेह अग्नि में लोर मत डारी
ई न बुझी, धधोर हो जाई
ताना मारें दीं गाँव गवई के
अउरी नेहिया सजोर हो जाई"
गाछ के पंकल पतई नियर लुहुर लुहुर, मोलायम, अंगूरी फिसले वाला जर्दा आम कहानिया रस के लाबालब आ पहाड़ी नदी खनिया बलखात ई ग़ज़ल सुन के कवन आदमी दीवाना ना हो जाई. दुसरका रचना देखीं :-
"देवरा कमलवा के फूल
ननद पुरइनिया के पाती
हमरो जेठानी हई नेहिया के अंचरा
सासु जी तीरथ स्थान
भइया लुटावे ले अपन सनेहिया
राखेली भउजिया धेयान
जेठ जी धरम रखवार
बलम जिनिगी के संघाती "
रउए बताई, एह गीत में पूरा परिवार के सुगंध बा की ना ? सांच में, अईसन परिवर सबके होखे त ई धरती स्वर्ग बन जाई. किरण जी के लिखल सरस्वती बंदना आजो हर गावे वाला के जबान पर बाटे:-
"मईया मोरी शारदा भवानी की
वर दे दअ वरदानी
जइसे सगरवा के पानी
की वर दे दअ वरदानी "
देश भक्ति के रस से सनाइल रचना जब उहाँ के पढ़ी त नौजवान के नस नस जोस जाग जाए. देखल जाव तनी उहो रचना के :-
" हिमालय बचा लअ हिमालय बचा लअ
वतन खतिर आपन लहू द ख़ुशी से
शहीदन में तू नाम आपन लिखा लअ
हिमालय बचा ल
ई भारत के गंगा, ब्रह्मा पुत्र सिन्धु
ईहे आपन यमुना बहिन नर्मदा हअ
ईहे गोमी कृष्ण कावेरी सतलज
ईहे अलखनंदा के अनुपम छटा हअ
भले जान जाए हिमालय न जाए
चल अ जान दे चमन के बचा ल अ "
एह तरह से हर रंग के रचना से सराबोर किरण जी रचना संसार ईन्द्रधानुशी रहे, देखे वाला के आँख खुलल रह जात रहे.
जिनिगी के आखरी छन में उहाँ के बहुत बेमार रहे लगनी. लइका लोग त सेवा में कवनो कमी न कइलास, हरदम तरहथी पर रखले रहल, बाकिर उमिर आ समय के आपन गति होखेला जवन रोकला से ना कबो रुकल बा ना रुकी. बेमारी के दौरान बेतिया के सारा साहित्यकार क तरफ से उहाँ के सम्मान में एगो कार्यकर्म उहें के निवास ' पिउनी बाग़, बसवरिया, बेतिया में रखल गइल रहे जेमे किरण जी " रउआ हंस दी त........... भोर गो जाई " आपन बहुत कमजोर आवाज में सुनवले रहनी. उहे काव्य पाठ उहाँ के अंतिम काव्य पाठ रहे.
आजू उहाँ के हमनी के बीच नईखी बाकिर उहाँ के आभा आजू हमनी के चारो ओर बिखरल बाटे. कवि सम्मलेन के मंच के रौशनी किरण जी बिन मधिम पड़ गइल बा .
किरण जी आपन जिनिगी के मतलब ईहे ख के विदा भइनी की :-
" हम पददलित के कवि गाँव के मजदूरन के नायक हई
गुणगान महल के करेब ना, हम त झोपडी के गायक हई
जे मित्र रहे दुश्मन भइल, हमरा कवनो चिंता नईखे
सुनसान डगर के रही हम जन गन मन अधिनायक हई "
(प्रस्तुति : सुरेश गुप्ता, गैस लाल चौक, पुरानी गुदरी, बेतिया. साभार : भोजपुरी जिनिगी, पृष्ठ संख्या २९-३३, अप्रैल- सितम्बर/ संयुक्तांक,२००९, संपादक : संतोष कुमार प्रकाशक : इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद्, नई दिल्ली)
२२ फ़रवरी १९२२ के दिन पिता सरयुग राम चौधरी आ माता भीखइन देवी के अंगना में जब ई बालक के अहिल्का रोअयाई सुनाई दिहलस, तब के जानत रहे की साक्षात् भगवन शिव के कल्याण भव लेके आवे वाला ई लइका शिव प्रसाद 'किरण' बन जाई आ भोजपुरी यात्रा में मिल के पत्थर मानल जाई.
एकदम गरीब आ पीछडल परिवार में जन्म लेवे वाला किरण जी लगे केहू 'गाड फादर' टाइप के आदमी ना रहे जे उनका के आगाड़ी बढ़ावे खातिर आपन पहुच आ पैरवी के इस्तेमाल ना कर सके. जवान कुछ थाती रहे, उ रहे उनकर आपन प्रतिभा, माता सरस्वती के आशीर्वाद के धन आ भोजपुरी खतिर कुछ कर देवे के लगन.
कलम के साधक किरण जी मूल रूप से कर्मयोगी रहनी. आजीविका खातिर जूता बनके बेचल आ साहित्य सेवा खातिर कलम चलावल - दुनु में सामान रूप से सफल रहनी. अभाव त बहुते रहे, जैसान की एगो पीछडल परिवार में रहेला बाकिर उ अभाव उनका आगे बढे में कबहूँ रोड़ा न बनल.
एह सिद्ध कवि के देवासन २ मार्च २००९ के भइल. आजू उहाँ के परिवार में दू गो बेटा, पतोह नाती पोता से भरल बाते, त आई किरण जी के चमक कहवा तकले रहे, केतना रहे, एकरा बारे में देखावल जाव.
सुरुवात करत बानी साहित्यिक संस्था के बनावे के उहाँ के भागीदारी से. बेतिया में जेतना साहित्यिक संस्था बने, किरण जी के आसिरबाद उ संस्था के जरूर मिले. उ संस्था हिंदी के होखे, उर्दू के होखे भा भोजपुरी के होखे, किरण जी रहला के मतलब रहे, उ संस्था के एगो अभिभावक आ सेवक दुनु एके साथ मिल गइल. आज बेतिया में एगो साहित्यिक संस्था बा 'अदबी संगम' जेकर शुरुवाती नाम ' भारतीय बज्मे सुखन' रहे एह संस्था के जवन बगइचा तईयार करे में किरण जी आ उहाँ के साहित्यिक परम मित्र नाजिम भारती जी आपन खून पसीना के एक एक बिरवा के सिचई कइनी. आजू उ मह मह करके महक रहल बा. एक संस्था से किशोरीलाल अंशुमाली, एम.एम. वफा, मंजर सुल्तान, क्रेक बेतियाबी, ए.के. नस्तर जईसन कवि शायर रूपी फुल आजू साहित्य जगत के खजाना बाड़े. एकर अलावा 'जिला साहित्यकार संगम' के बनावे में उहाँ के जी तोड़ प्रयास से रामचंद्र राही , जगत भूषण राज, रविद्र रवि, प्रीतम बावरा जईसन नया कलमकार आपन पहचान बनावे में लागल बाड़े. जिला हिंदी साहित्य सम्मलेन, साहित्य कला संगम, अखिल भारतीय भोजपुरी भासा सम्मलेन जईसन कई गो संस्था से उहाँ के जुडल रहीं.
किरण जी के प्रतिभा के इज्जत सगरे साहित्य जगत रहे, ई बात के सबूत बाटे उहाँ के मिले वाला कई गो सम्मान आ पुरस्कार. उहाँ के जवन जवन संस्था सम्मान दिहलस ओकर नाम रहे - भारतीय साहित्य परिषद्, रामकोला, देवरिया, उ.प., रविदास साहित्य परिषद्, एकमा, सरन, चंपारण जिला हिंदी साहित्य सम्मलेन, बिहार, विधार्थी साहित्य संगम (बेतिया, बिहार), युवा साहित्यकार परिषद(पटना, बिहार), नेपाली भोजपुरी साहित्य कला परिषद्, नेपाल, अखिल भारतीय दलित साहित्य परिषद् दिल्ली, भिखारी ठाकुर भोजपुरी साहित्यकार परिषद्, सकल डीहा, संत रविदास अम्बेडकर विचार मंच (बेतिया), आदि. सांच पूछी त ई सारा संस्था किरण जी के सम्मान देके अपना के सम्मानित कइलस, काहे से की सूरज भगवन के जल ढरला से ढारे वाला के ही कल्याण होला ना की सूरज भगवन के.
जहाँ तक रचना संसार के सवाल बाटे, किरण जी जबले जीअल रहनी, भोजपुरी रचना संसार उहें के नींद से जगत रहे आ उहे के नींद से सूतत रहे, भोजपुरी के हर रचनाकार खतिर किरण जी के निवास तीरथ स्थान से कम न रहे. उहाँ के भी आपन रचना धर्मी होखे के धरम पूरा ईमानदारी से निभवनी. भोजपुरी लिखेवाला के त तरह से उत्साहित करत रहनी की जैसे उ रचनाकार कवनो आपन सगा सम्बन्धी होखे भा ओकरा से खून के रिश्ता होखे. कवि सम्मलेन में त उहाँ के मंच पर रहला के मतलब रहे की श्रोता लोगन के भरपूर मानसिक खुराक मिलबे करी. का मधुर आवाज, का पड़े के अंदाज, आ सबदन के केतना सटीक आ मारक प्रोयोग, सुनेवाला त गदगद हो जाट रहे. कबो कबो त हालत ई बन जाट रहे की संचालक किरण जी के सबसे अंत में एह से बोलावत रहे ताकि श्रोता के संख्या अंत तक बनल रहे. खाड़ी के कुरता पईजमा पहिनले सवार रंग के अगो किरण जी के मुंह से भोजपुरी के किरिन फूटे त कवि सम्मलेन के पंडाल में एगो अद्भुत आभा बिखर जात रहे. मंचन पर बड़का बड़का नाम उहाँ के साथ काव्य पाठ कर के अपना के बडभागी समझे. १९५० मे उहाँ के आ मंच के आजू के भोजपुरी के लमहर नाम अनिरुद्ध जी के साथै काव्य पाठ कइले रहनी. ई उहे अनिरुद्ध जी हई जिनकर मशहूर गीत ह " एक घडा माथे पर धइली, दूजा चढ़ल कमरिया" अब रउरा सोचत सके नि की जब दू गो दिग्गज मंच पर आपन भोजपुरी के तीर छोडले होईहे त श्रोता के का हल भइल होई. उहे अनिरुद्ध जी के जब भेट २००५ में कविवर डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना से भइल त किरण जी के बारे में ढेर सवाल आ उहाँ के हल-चाल पूछ बईठनि त ई रहे किरण जी के प्रभाव की ५५ साल के बड़ो कवनो लमहर कवि उहाँ के याद रखले रहे.
आकाशवाणी से किरन जी दर्जनों बार काव्य पाठ कइले रहली. भोजपुरी क्षेत्र के लोग त एह दिन के बाट जोहे की कहिया रेडियो स्टेशन से किरण जी के रसगर आवाज सुनाई दी.
रचना छपे के मामला में किरण जी बहुत आगे रहनी. हिंदी आ भोजपुरी में कई गो स्थानीय पत्र-पत्रिका में छ्पला के अलावा आर्यावर्त, प्रदीप जईसन प्रतिष्टित हिंदी दैनिक में भी छप चुकल बानी. उहाँ के आपन प्रकाशित पुरस्तक रहे " भोजपुरी के नये गीत आ गीतकार", "भोजपुरी कविता कुञ्ज", "माटी के बोली", 'आजादी के सपने' , रिमझिम, घायल गीत, सिसकते सरगम आदि.
अब आई, किरण जी के कुछु भोजपुरी रचना के मिठास लिहल जाव. शुरुवात करत बानी हम उ रचना से जवन सबसे जादा लोग सुनले बा आ उहाँ के पहिचान बनल. उ रचना रहे एगो ग़ज़ल जवना के गोरखपुर आकाशवाणी त न जाने केतना बेर प्रसारित कइलस. तनि देखि उ ग़ज़ल के :-
" रउआ हंस दी त भोर हो जाई
सगरो अंगना अंजोर हो जाई
नेह अग्नि में लोर मत डारी
ई न बुझी, धधोर हो जाई
ताना मारें दीं गाँव गवई के
अउरी नेहिया सजोर हो जाई"
गाछ के पंकल पतई नियर लुहुर लुहुर, मोलायम, अंगूरी फिसले वाला जर्दा आम कहानिया रस के लाबालब आ पहाड़ी नदी खनिया बलखात ई ग़ज़ल सुन के कवन आदमी दीवाना ना हो जाई. दुसरका रचना देखीं :-
"देवरा कमलवा के फूल
ननद पुरइनिया के पाती
हमरो जेठानी हई नेहिया के अंचरा
सासु जी तीरथ स्थान
भइया लुटावे ले अपन सनेहिया
राखेली भउजिया धेयान
जेठ जी धरम रखवार
बलम जिनिगी के संघाती "
रउए बताई, एह गीत में पूरा परिवार के सुगंध बा की ना ? सांच में, अईसन परिवर सबके होखे त ई धरती स्वर्ग बन जाई. किरण जी के लिखल सरस्वती बंदना आजो हर गावे वाला के जबान पर बाटे:-
"मईया मोरी शारदा भवानी की
वर दे दअ वरदानी
जइसे सगरवा के पानी
की वर दे दअ वरदानी "
देश भक्ति के रस से सनाइल रचना जब उहाँ के पढ़ी त नौजवान के नस नस जोस जाग जाए. देखल जाव तनी उहो रचना के :-
" हिमालय बचा लअ हिमालय बचा लअ
वतन खतिर आपन लहू द ख़ुशी से
शहीदन में तू नाम आपन लिखा लअ
हिमालय बचा ल
ई भारत के गंगा, ब्रह्मा पुत्र सिन्धु
ईहे आपन यमुना बहिन नर्मदा हअ
ईहे गोमी कृष्ण कावेरी सतलज
ईहे अलखनंदा के अनुपम छटा हअ
भले जान जाए हिमालय न जाए
चल अ जान दे चमन के बचा ल अ "
एह तरह से हर रंग के रचना से सराबोर किरण जी रचना संसार ईन्द्रधानुशी रहे, देखे वाला के आँख खुलल रह जात रहे.
जिनिगी के आखरी छन में उहाँ के बहुत बेमार रहे लगनी. लइका लोग त सेवा में कवनो कमी न कइलास, हरदम तरहथी पर रखले रहल, बाकिर उमिर आ समय के आपन गति होखेला जवन रोकला से ना कबो रुकल बा ना रुकी. बेमारी के दौरान बेतिया के सारा साहित्यकार क तरफ से उहाँ के सम्मान में एगो कार्यकर्म उहें के निवास ' पिउनी बाग़, बसवरिया, बेतिया में रखल गइल रहे जेमे किरण जी " रउआ हंस दी त........... भोर गो जाई " आपन बहुत कमजोर आवाज में सुनवले रहनी. उहे काव्य पाठ उहाँ के अंतिम काव्य पाठ रहे.
आजू उहाँ के हमनी के बीच नईखी बाकिर उहाँ के आभा आजू हमनी के चारो ओर बिखरल बाटे. कवि सम्मलेन के मंच के रौशनी किरण जी बिन मधिम पड़ गइल बा .
किरण जी आपन जिनिगी के मतलब ईहे ख के विदा भइनी की :-
" हम पददलित के कवि गाँव के मजदूरन के नायक हई
गुणगान महल के करेब ना, हम त झोपडी के गायक हई
जे मित्र रहे दुश्मन भइल, हमरा कवनो चिंता नईखे
सुनसान डगर के रही हम जन गन मन अधिनायक हई "
(प्रस्तुति : सुरेश गुप्ता, गैस लाल चौक, पुरानी गुदरी, बेतिया. साभार : भोजपुरी जिनिगी, पृष्ठ संख्या २९-३३, अप्रैल- सितम्बर/ संयुक्तांक,२००९, संपादक : संतोष कुमार प्रकाशक : इन्द्रप्रस्थ भोजपुरी परिषद्, नई दिल्ली)
ग़ज़ल
आसा नायारण प्रसाद 'अशोक' के एगो ग़ज़ल
दर्द में अब का कवनो दवा काम दी ?
विष भरल बह रहल का हवा काम दी ?
केतना टुकड़ा भइल आजू दिल के ईहाँ
तोपअ चेहरा का अब आईना कम दी ?
राउर दुअरा पर खडी आईल टूटल कमर
के तरे सोंच लीं जी दुआ काम दी ?
तार नेहिया के टूटल सगर मोड़ पर
अब पराइल का का आसरा काम दी ?
होके गुमनाम कतहूँ गुजारे परल
वक्त, मितवा के का दुअरा काम दी ?
(आदरणीय अशोक जी रेशम कोठी, वीर गंज-६, नेपाल में रहेनी)
पाण्डेय कपिल जी के एगो ग़ज़ल
अब त जियल पहाड़ लागत बा
काहे जिनिगी उजाड़ लागत बा
काहे अपनन से केहू बतियावो
एहूँ अंगना में बाड़ लागत बा
का करो ई चना, अकेला बा
तनिको फूटल ना भाड़ लागत बा
बंद बा हो रहल गईल - आईल
बीच राहे प झाड लागत बा
झर रहल बा जहें - तहें ओढना
एही मौसम में जाड लागत बा
(साभार : पाण्डेय कपिल के ग़ज़ल संग्रह 'परिंदा उड़ान पर' ग़ज़ल संग्रह से, पाण्डेय कपिल जी के आवास, भोजपुरी संसथान, ३/९, इन्द्रपुरी, पटना - २४)
दर्द में अब का कवनो दवा काम दी ?
विष भरल बह रहल का हवा काम दी ?
केतना टुकड़ा भइल आजू दिल के ईहाँ
तोपअ चेहरा का अब आईना कम दी ?
राउर दुअरा पर खडी आईल टूटल कमर
के तरे सोंच लीं जी दुआ काम दी ?
तार नेहिया के टूटल सगर मोड़ पर
अब पराइल का का आसरा काम दी ?
होके गुमनाम कतहूँ गुजारे परल
वक्त, मितवा के का दुअरा काम दी ?
(आदरणीय अशोक जी रेशम कोठी, वीर गंज-६, नेपाल में रहेनी)
पाण्डेय कपिल जी के एगो ग़ज़ल
अब त जियल पहाड़ लागत बा
काहे जिनिगी उजाड़ लागत बा
काहे अपनन से केहू बतियावो
एहूँ अंगना में बाड़ लागत बा
का करो ई चना, अकेला बा
तनिको फूटल ना भाड़ लागत बा
बंद बा हो रहल गईल - आईल
बीच राहे प झाड लागत बा
झर रहल बा जहें - तहें ओढना
एही मौसम में जाड लागत बा
(साभार : पाण्डेय कपिल के ग़ज़ल संग्रह 'परिंदा उड़ान पर' ग़ज़ल संग्रह से, पाण्डेय कपिल जी के आवास, भोजपुरी संसथान, ३/९, इन्द्रपुरी, पटना - २४)
ग़ज़ल
स्वर्गीय पाण्डेय आशुतोष जी के एगो ग़ज़ल
रात के बाद निहिचित बा दिन होई
हो सकेला की उगतो किरिन होई
साथ देहल कठिन ह अंहरिया के
उ टाहाटह अंजोरिया त फेनु होई
देखींल सींत अरुआ के पतइन पर
लोर का ह, ई बतिया यकीन होई
गीत सुनला, सुनवला से होला दरद
बिनु दरद के त जियल कठिन होई
कवनो कवनो तरह चल रहल साँस
के बताई की कब इ उरिन होई
( पाण्डेय आशुतोष जी हिंदी आ भोजपुरी के सशक्त हस्ताक्षर रहीं. ईहा के मलकौली, बगहा, प. चंपारण, बिहार में घर बा. ईहा के भोजपुरी के पत्रिका " पुरवैया" डाइजेस्त के प्रकाशन आ संपादन कइनी. मंच से ईहा के खूब सराहना बटोरनी . भारत के सयदे कोनो मंच होखे जहाँ आपन हिंदी आ भोजपुरी के रचना ना सुनवले होखम.)
बैदेही सरन बनियापुरी के एगो ग़ज़ल
कइसे बताई दर्द हम अंखियन का लोर के
के ले गइल क्रेज के क्न्ख्वा खंखोर के
कतना बनल आकाश में असरा के ताजमहल
पर बुझ गइल चिराग अब सोहिला सहोर के
पपनी के पीर बढ़ गइल प्रीतम के गाँव में
देखल गुनाह हो गइल बेखम चकोर के
कस्ती डूबल स्नेह के सन्देश झील में
सपना सहेजल जल उठल सावन का भोर के
जिनगी जवान नहाके जंजाल में फंसल
अब कब तलक बइठल रहब रहिया अगोर के
बेसब्र दिल के इम्तिहान का कोई करी
तोहफा में दर्द बा मिलल आंसू चभोर के
(कवि : श्री बैदेही सरन बनियापूरी, बनियापुर, सारण निवासी बानी.)
रात के बाद निहिचित बा दिन होई
हो सकेला की उगतो किरिन होई
साथ देहल कठिन ह अंहरिया के
उ टाहाटह अंजोरिया त फेनु होई
देखींल सींत अरुआ के पतइन पर
लोर का ह, ई बतिया यकीन होई
गीत सुनला, सुनवला से होला दरद
बिनु दरद के त जियल कठिन होई
कवनो कवनो तरह चल रहल साँस
के बताई की कब इ उरिन होई
( पाण्डेय आशुतोष जी हिंदी आ भोजपुरी के सशक्त हस्ताक्षर रहीं. ईहा के मलकौली, बगहा, प. चंपारण, बिहार में घर बा. ईहा के भोजपुरी के पत्रिका " पुरवैया" डाइजेस्त के प्रकाशन आ संपादन कइनी. मंच से ईहा के खूब सराहना बटोरनी . भारत के सयदे कोनो मंच होखे जहाँ आपन हिंदी आ भोजपुरी के रचना ना सुनवले होखम.)
बैदेही सरन बनियापुरी के एगो ग़ज़ल
कइसे बताई दर्द हम अंखियन का लोर के
के ले गइल क्रेज के क्न्ख्वा खंखोर के
कतना बनल आकाश में असरा के ताजमहल
पर बुझ गइल चिराग अब सोहिला सहोर के
पपनी के पीर बढ़ गइल प्रीतम के गाँव में
देखल गुनाह हो गइल बेखम चकोर के
कस्ती डूबल स्नेह के सन्देश झील में
सपना सहेजल जल उठल सावन का भोर के
जिनगी जवान नहाके जंजाल में फंसल
अब कब तलक बइठल रहब रहिया अगोर के
बेसब्र दिल के इम्तिहान का कोई करी
तोहफा में दर्द बा मिलल आंसू चभोर के
(कवि : श्री बैदेही सरन बनियापूरी, बनियापुर, सारण निवासी बानी.)
डॉ. अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा जी के एगो कविता
कवन परी ?????
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
चन्दन तन- चम्पई,
नेह के घरौंदा
मनिहारिन लौट गइल
रेट में बना के
पाहून गुलाब
परदेशी गवरईया
भाग गइल आज
कहीं डिठना लगाके
देह के मडईया में
आकुल मन मैना
फुदुक फुदुक राह खोजे
घेंट उचका के
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
(साभार : "चंपा के फुल" )
(स्वर्गीय डॉ. अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा "अखिलेश" के जनम मेहसी पुरबी चंपारण में भेल रहे, बाकि सारा जीवन बेतिया में गुजर देनी. हिंदी औरी भोजपुरी के कवि, लेखक औरी पत्रकार अखिलेश जी दैनिक नवरास्त्र के सम्पादकीय बिभाग में रहल अबनी. ईह्हा के मौजी राम के डायरी लेख बड़ा मसहुर रहे.)
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
चन्दन तन- चम्पई,
नेह के घरौंदा
मनिहारिन लौट गइल
रेट में बना के
पाहून गुलाब
परदेशी गवरईया
भाग गइल आज
कहीं डिठना लगाके
देह के मडईया में
आकुल मन मैना
फुदुक फुदुक राह खोजे
घेंट उचका के
कवन परी उतर गइल,
रंग में नहा के
रूप के तलईया में,
डुबकी लगा के
(साभार : "चंपा के फुल" )
(स्वर्गीय डॉ. अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा "अखिलेश" के जनम मेहसी पुरबी चंपारण में भेल रहे, बाकि सारा जीवन बेतिया में गुजर देनी. हिंदी औरी भोजपुरी के कवि, लेखक औरी पत्रकार अखिलेश जी दैनिक नवरास्त्र के सम्पादकीय बिभाग में रहल अबनी. ईह्हा के मौजी राम के डायरी लेख बड़ा मसहुर रहे.)
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