जब आदमी काठ पत्थर हो जाला
भाव से/ विचार से/ हियाव से
त ओकरा मुंह के
पानी उतर जाला
जइसे मुरझा जला फूल
सेरा जाला सूरज
दगिया जाला चान
राहू के कटला पर / डँसला पर
जइसे कटेला / घटेला
ओइसहीं आदमी के जिनगी में
गिरावट के असर लउकत बा/
निमन लोग रोअता
लुच्चा छउकत बा
मूस जइसे कुतर देला / सज्जी
कागज पत्तर / बस बुझीं
गिरावट खा रहल बा आदमी के
गत्तर गत्तर
घुन नियर खोखला कर रहल बा
हाव हाव के भाव
आ आदमी के ई नइखे बुझात
कि उ भीतरे भीतरे सड़ रहल बा
गल रहल बा / जल रहल बा
मर ता / ई त होखाही के बा
कहे कि गिरावट के इहे लाभ ह
बाकिर कब के बुझी
ई बुझात नइखे.
(इ हमार कविता 'भोजपुरी माटी'(कलकत्ता) के जून अंक २००९ में छपल रहे.)
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namaste sir,
ReplyDeletebahut bhaut shukriya ki rauaa aapan kavita "Girawat" ke sarvajanik roop se blog pe pesh kaini.rauaa se ego anurodh baa ki kripya kar ke "Phoolsunghi"(a bhojpuri novel by pandey kapil)pustak ke mile ke jaankari hamra ke deen.ekar khatir hum rauaa ke bahut bahut abhaari rahab.
mrinal dev
patna
aapke kavita bahut acha lagal
ReplyDeletebHOJPURRI SONG DOWNLOAD