Monday, July 12, 2010

गिरावट

जब आदमी काठ पत्थर हो जाला
भाव से/ विचार से/ हियाव से
त ओकरा मुंह के
पानी उतर जाला
जइसे मुरझा जला फूल
सेरा जाला सूरज
दगिया जाला चान
राहू के कटला पर / डँसला पर
जइसे कटेला / घटेला
ओइसहीं आदमी के जिनगी में
गिरावट के असर लउकत बा/
निमन लोग रोअता
लुच्चा छउकत बा
मूस जइसे कुतर देला / सज्जी
कागज पत्तर / बस बुझीं
गिरावट खा रहल बा आदमी के
गत्तर गत्तर
घुन नियर खोखला कर रहल बा
हाव हाव के भाव
आ आदमी के ई नइखे बुझात
कि उ भीतरे भीतरे सड़ रहल बा
गल रहल बा / जल रहल बा
मर ता / ई त होखाही के बा
कहे कि गिरावट के इहे लाभ ह
बाकिर कब के बुझी
ई बुझात नइखे.
(इ हमार कविता 'भोजपुरी माटी'(कलकत्ता) के जून अंक २००९ में छपल रहे.)

शहरी जिनिगी

ना गंवई माटी के सुगंध बा
ना कही सोन्हाई
ना कोइल के कुहू कुहू बा
ना मुर्गा के बांग
बस बा त कागज के फूल
कागज के माला
कहीं छोटका त कहीं बड़का नाला
तितली के बदले उड़ेले माछी
भिनभिनात / घीन बाटत
बज बज नाली के बदबू
बुझाता/ लील गइल
भाव के ख़ुशबू
मुर्गा के बांग / आ टांग लोग खा रहल बा
एही में का रहन सहन के सुख
पा रहल बा ?
शहरी बाबू लोग बिना चिकन-मटन के
खात नइखे
बिना दारू के नहात नइखे
हवास बा/ तनिके में चान छुवे के
कुछुवो नइखे होखत त
नेतागिरी के सहारा बा
धोखा के गड़हा में सबका के गिरा के
अपने अगुवाए के बा/ हिरअराए के बा
भले केहू मरो/ आपन पेट त भरो
अपनापन मुर्गे नीयर कटा गइल
बाबूजी छोटका में माई बड़का में
रहिहें/ खइहे
बाकिर अपना मन से कतही
ना जइहें
इहे शहरी जिनिगी के हाल बा
कमाल बा / आ हमनी के बूझत बानी
इहे सुख ह/ ना जानी इ विचार
कहाँ ले जाई / का करी
आ आदमी एही में अझुराइल / कबले ले मरीं