Thursday, September 20, 2012

डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना के एगो भोजपुरी कविता "बरतुहारी"

"बरतुहारी" सबले सहज उपाय बा एगो दूर होई बेकारी छोड़ छाड़ के चिंता सज्जी कर लीं बरतुहारी शादी ठीक करावत फिरीं घर में डाल के ताला पाँच गाँव में नाम हो जाई लोग कही गुनवाला एही बले बूते खाई ठगी ठगी रोज उधारी अनकर मुडी बेल बराबर खरच के छोड़ी चिंता भाडा आवे जाये के लीं एह में कइसन हीनता ना आपन होखे कुरता तऽ मांग के उनकर झारीं जागल भाग कहीं अपने के बननी कतहीं अगुआ पांचो अंगूरी घीव में बुझीं होई रोजे फगुवा दाल भात दही पापड़ चाभीं बैगन के तरकारी अगुआ तिकड़म वाला होलें उनको बाटे भयलू कहाँ बनले आगुआ ऐरू गेरू नथ्थू खैरु राम ! की आगुआ हो जइते घोषित नौकर सरकारी माथे मउर चढ़ेला, कहवां बिना कहीं आगुआ के दूल्हा बनि के सपना पूरा कब होई बबुआ के आगूआ आगू हरेलें गौ -बैलन के व्यापारी

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